डॉ.मुकेश मीणा
आंशिक रूप से इंडिया में वर्ण विभाजन हुआ ,लेकिन प्राचीन काल में नही आधुनिक काल में अन्ग्रेजो के द्वारा । इसके क्या कारण थे इसे समझते हैं ।अंग्रेजो का लेबर मैनेजमेंट बहुत अच्छा था उसमें आधुनिक सिद्धान्तों का समावेश था जो उनसे पहले इंडिया में कही भी नही दिखाई देता । अग्रेजो की प्रशासनिक प्रणाली पूर्णतया औपचारिक नियमो पर आधारित थी । अंग्रेजों ने अपने कर्मचारियों के लिए ऐसे नियम बना रखे थे कि वे स्थानीय लोगो से घुल मिल ना सकें, जिससे उनके हित मिलने के कारण विद्रोह ना कर सके ।
इसलिए अंग्रेजो ने हर उपनिवेश में ज्यादातर दुसरे देशों से लोगों को लाकर बसाया। बाहरी लोग स्थानीय लोगों से घुल मिल नही पाते थे और पुरी तरह अंग्रेजो पर निर्भर रहते थे ।इसका उदाहरण पुरे अफ्रीकन महाद्वीप में इंडियन लोगो को स्थापित करना रहा है ।
इसके साथ ही अंग्रेज अपनी नस्ल के लोगो को भी उपनिवेशों में स्थायी रूप से नही बसाना चाहते थे, क्योकि इसका परिणाम वो अमेरिका में देख चुके थे । यूरोपियन नस्ल के लोग स्थानीय लोगो से मिलकर विद्रोह कर सकते थे ।
इसलिए या तो कमर्चारी/दास उपनिवेशों में सदूर देश से लाकर स्थापित किये गए , या उन लोगों को कर्मचारी बनाया गया जो स्थानीय लोगो से अलग हों और व्यापार तथा अन्य किसी कारण से यहाँ स्थापित हो गए थे । अफ्रीका के दक्षिण भाग और अन्य देशो में बाहर से आये हुये लोग नही थे परन्तु इंडिया शुरू से समर्थ था इसलिए इण्डिया में ऐसे समूह मोजूद थे , जिसमें व्यापारी के रूप में दक्षिण पूर्व के देशो से आये जैनी व्यापारी, विभिन्न मुस्लिम और गैर मुस्लिम सम्प्रदायों के रूप में स्थापित अरब के व्यापारी, हिमालय के दर्रो और स्थल मार्ग से विभिन्न कारणों से आये धार्मिक और गैर धार्मिक शरणार्थी तथा धर्म की क्रिया सम्पन्न करने वाले व्यक्ति प्रमुख थे । ये बाहरी लोग जो टुकड़ो में इंड़िया में स्थापित हुए तथा किसी बड़ी स्थानीय जाती से सम्बद्ध नही थे और कई मामलों में स्थानीय लोगो से अलगाव से ग्रसित थे । लेकिन ये पर्याप्त संख्या में थे । ये समूह इंडिया के समुद्र तटीय क्षेत्रों ,व्यापारिक मार्गों, धार्मिक स्थलों और बडे और छोटे शहरों में स्थित थे, जहा इनके लिए सर्वाइव करने के लिए संसाधन उपलब्ध थे ।
अब इन लोगो का रुपान्तारण और समामेलन हिन्दू और मुस्लिम में किस प्रकार होता है यह जानना महत्व पूर्ण है ।अंग्रेजो को तीन तरह के लोगों की आवश्यकता मुख्य रूप से थी:- कागज का काम करने वाला सरकारी बाबू, अंग्रेजों के बनाए माल को बेचने वाला और कच्चा माल अंग्रेजों तक पहुचाने वाला व्यापारी और साहूकार , लगान वसूलने वाला और स्थानीय जनता को नियंत्रित करने वाला जमीदार । सेना और पुलिस में स्थानीय जातियों के लोग थे। पर इन स्थानीय जातियों मे एक दूसरे से समन्वय बनाकर रखा जाता था जिससे विद्रोह न हो सके ।
अब इनमें रुपान्तरण और समामेलन कैसे हुआ, किनके बीच हुआ ,इसको समझने के लिए वैश्य वर्ण का उदाहरण लेते हैं। गुजरात जो इंडिया का सबसे बड़ा तटीय क्षेत्र रखता है , यहाँ व्यापार में जैनियों का बाहुल्य है। जैनियों की जनसंख्या गुजरात से दक्षिण राजस्थान होते हुए अरावली की पहाडियों के राज्यों से होते हुए दिल्ली तक पहुचती है। तो आपको जैन से बनिया/वैश्य बने लोग मिलते चले जाते हैं। जैनी महेश्वरी जो कुछ समय पहले तक अपने को जैनी ही कहते थे, थोड़े बहुत जैनी अग्रवाल और अन्य में भी मिल जाते हैं। उदयपुर में तो कुछ जैन अपना सरनेम चौधरी लगाते हैं। यही स्थिति गुजरात में पटेलों के सरनेम में भी दिखाई देती है । जो स्पष्ट करती है जैनियों से अन्य व्यापारिक जातियों का उदय हो रहा है,अर्थात गुजरात और.राजस्थान में जैनीयों का बनियों में रुपान्तारण स्पष्ट है ,और यह स्थिति आज भी प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित है जिसको आज भी कोई देख सकता है। जैनियों का विस्तार MP, झारखण्ड,छतीसगढ़ में भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। कई जगह ये अपने मूल नाम से हैं और कई जगह दुसरे नाम से जाने जाते हैं । इसी प्रकार मारवाड़ी के नाम से जाने जाने वाले बनियों में भी जैनी प्रमुख हैं।
वैश्य वर्ग का एक अन्य समूह जो आजादी से पूर्व के पंजाब से आता है आज पंजाबी के रूप में स्थापित है ,जिसमे अरोड़ा ,खत्री,मल्होत्रा आते हैं। इनकी नस्ल एक दम अलग है जो इन्हें पश्चिम के क्षेत्रो से मिलाती है,ये आज हिंन्दू वैश्य वर्ण का भाग बने हुए हैं। ये कई स्थानों पर सिक्ख धर्म धारण किये हुए हैं। पश्चिम से मुसलमानों के उदय से पहले और उसके बाद आने वाली गैर मुसलमान जातियां जो सदियों से व्यापारी जातियों के रूप में आती रही हैं कब इंडिया आकर हिन्दू / सिक्ख धर्म की अनुयायी बन गयी लोगो को पता ही नही चला । यह स्थिति पश्चिम की व्यापारिक जातियों का वैश्य वर्ण में समामेलन स्पष्ट करती है ।
यही स्थिति सिन्धी जातियों के साथ है ,लोग इनको हिन्दू ही मानते हैं, लेकिन ये अपनी धार्मिक पहचान आज भी अलग ही बनाये हुए हैं।सिंध पाकिस्तान में है और पाकिस्तान में ये पश्चिम नस्ल की व्यापारी जाति रही है जो अरब के देशो से आते रहे हैं, और इंडिया में आकर वैश्य वर्ण में स्थापित हो गए हैं।
इसी प्रकार बिहार और युपी में बनी कायस्थ जाती अंग्रेजो के काल में वैश्य वर्ण में स्थापित हो गयी । उड़ीसा के तटीय क्षेत्र के लोग जो मलेशिया से अपनी निकटता के लिए जाने जाते हैं आज वैश्य वर्ण में स्थापित हो गए हैं। इसके अलावा आज वैश्य वर्ण में इन प्रमुख जातियों के साथ व्यापार वाणिज्य के प्रसार के कारण कुछ स्थानीय छोटी जातियां भी सम्मिलित हो रही हैं। अर्थात वैश्य वर्ण का निर्माण एक आधुनिक घटना है और इनके कर्म कांड इनके व्यक्तिगत हैं। जिसे वैश्य वर्ण का नाम देकर सामूहिक बनाया गया है जिन मे कोई समानता नही है ।इस वर्ण में दुसरे धर्म के जैनी, सिन्धी,पश्चिम अरब देशो के संप्रदाय,पूर्वी देशो के शरणार्थी और व्यापारी घुस गए हैं। वैश्य वर्ण के नाम पर हिन्दू नाम सामूहिक पहचान से ये स्थानीय जातियों से संम्बंध स्थापित करने में सफल रहे हैं, और कई स्थानों पर उनकी पहचान को प्रयोग में लेते हैं। इस प्रकार वैश्य वर्ण एक आधुनिक फेनोमिना है बाकि अगली कड़ी में ……….
